सोचता हूँ कुछ लिखूं , पर क्या लिखूं ये तय नहीं है.. दिमागी घोड़े सरपट दौड़ रहे है ये लिखूं वो लिखूं पर क्या लिखूं ये समझ नहीं पाया हूँ अभी तक !! खैर जो मन बकेगा वही लिख दूंगा ... पसंद आये या न आये !!
अपने घर में छोटा हूँ तो माँ बाप से प्यार भी मिला और सभी भाई बहनों का स्नहे भी... परिवार लम्बा चौड़ा होने से पता भी नहीं चला कब हम बड़े हुए.. क्या वो दिन थे जब हम सब संयुक्त परिवार में थे !! 28 जनों का परिवार 3.40 एकड़ के घर में.. घर क्या "खन्ना विल्ला" उर्फ़ बगीचा था और उसमे 3 दादा का परिवार एक 'चौका' में खाता... हम सब 6 भाई 8 बहन का पूरा कब्जा घर पर था !! आज भी सोच के मन रोमांचित हो जाता है !!
धीरे धीरे समय ने करवट ली और दादा लोग के बीच में बटवारा हुआ... तब हम 15 साल के थे.. अहसास सब हो रहा था बड़ा परिवार और घर में बर्तन ज्यादा!! ये बात 1977 की है.. तब पिता जी कि नौकरी थी और हम सब पटना में रह कर पढ़ते थे !! बड़ा भाई विकास पढने में कमजोर शुरू से था, पर दिमाग का इंजीनियर साथ में तिकड़मी भी !! पर इस बटवारे के चक्कर में पिताजी को बार बार बनारस आना पड़ता... परिवार वालो ने ये काम पिता जी और छोटे चाचा जी के जिम्मे सौपा !! जो इन दोनों ने बखूबी निभाया.. खैर किसी को कोई तकलीफ नहीं हुई..!!!
उसके बाद सन 1980 में हमारे दादा जी के बेटों में भी बटवारा हुआ, तब पिताजी को अपना ट्रांस्फर वापस बनारस लेना पड़ा और हमारे दादा जी का परिवार भी तीन हिस्से में टूट गया.. खैर बड़े ताऊ जी के हिस्से में घर का सबसे अच्छा हिस्सा आया, फिर दुसरे ताऊ जी का और पिता जी... हमलोग के हिस्से में घर का सबसे खराब हिस्सा जो कोई लेना नही चाहता था एक कुआं, नहाने का घर, पौदरी और एक दो कमरा 12 बिस्सा जमीन !! सबका कहना था पिता जी से "मुन्ना तुम सक्षम हो" तुम फिर खड़े हो जाओगे ये वाल हिस्सा तुम रख लो !!
आज 33 साल बाद हम फिर बटवारे का दर्द झेल रहे है, अब हम दोनों भाइयों में भी बटवारा !! पर ये बटवारा बहुत दर्द दे रहा है ! पिता जी का देहांत 25 मार्च 2007 में हो चूका है, माँ है जो चाह कर भी बोल नहीं पाती, पर एक दिन अगले ने विस्फोट कर ही दिया !!
एक बात एक दम सत्य है.. माँ बाप अपनी पहली औलाद के प्रति ज्यादा समर्पित रहते है उनका लगाव जुड़ाव उसके प्रति ज्यादा होता है.. बड़ा होने के चलते वो घर में दम भी भरता और सब को उसकी बात माननी पडती हैं !! मन बढ़ा तो रावण हुआ और फिर अहंकार का घड़ा भर जाता है.. मन में छिपा विद्रोह कभी न कभी फूटता है... मेरे साथ भी हुआ ! जीवन में कभी न सोचा था कि घर का बटवारा होगा.. हम भी आज उस मुकाम पे पहुच गये !!
बटवारा नाम सुन कर मन बड़ा अजीब हो जाता.. बटवारे में दर्द होता है एक गहरी टीस होती है, सालो दर्द देती है.. वो दर्द आप ही महसूस कर सकते हैं.. घर के और लोग इससे बेखबर.. सबकी अपनी दुनिया जो है !! हिन्दुस्तान पाकिस्तान का बटवारा तो हमनें नहीं देखा पर उस बटवारे से मिले दर्द को आज भी मुल्क के दोनों तरफ के लोग महसूस करते हैं !! लोग कहते हैं सब वख्त करता है... हम कहते हैं हालात हम खुद बनाते हैं !!
मेरा खुद का विवेक जवाब दे गया है यहाँ !!
3 comments:
गजब का खंजर है लगे भी और रोने भी ना दे ......... बंटवारा
जब अपनों से परिचय होती है तो न जाने क्यों दिल दुखता है।
ये प्रकृति का मजाक है या दिल की कमजोरी।
dard hi dard deta hai batwara
kisi ko nahi milta sahara
tut jata hai dil hamara
dekhta hai sansar sara
ab hume koi nahi payara
kyoki do guto me bat gaya ghar hamara
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